

2021 से 2025 के बीच साइबर अपराधियों ने प्रदेश के लोगों को लगाया 468 करोड़ से अधिक का चूना, हर साल बढ़ता गया ठगी का ग्राफ; ऑनलाइन ट्रेडिंग और डिजिटल अरेस्ट बने ठगों के सबसे बड़े हथियार
हरिद्वार। उत्तराखंड में साइबर अपराधियों ने ऐसा जाल बिछा रखा है, जिसमें पढ़े-लिखे लोग, नौकरीपेशा, कारोबारी और बुजुर्ग तक फंसते जा रहे हैं। कभी ऑनलाइन निवेश में मोटा मुनाफा कमाने का लालच, कभी डिजिटल अरेस्ट का खौफ तो कभी बैंक अधिकारी बनकर खाते की जानकारी हासिल करने का खेल। साइबर ठगों ने लोगों की जीवनभर की जमा पूंजी को निशाना बना लिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि वर्ष 2021 से 2025 के बीच उत्तराखंड में साइबर ठगी की करीब 90 हजार शिकायतें दर्ज हुईं और ठग 468 करोड़ रुपये से अधिक की रकम लोगों के खातों से उड़ा ले गए।
साइबर अपराध के बढ़ते मामलों ने प्रदेश की पुलिस और बैंकिंग व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि पांच वर्षों में साइबर ठगी की शिकायतों में सात गुने से अधिक की वृद्धि हुई है। वर्ष 2021 में जहां शिकायतों की संख्या 4,492 थी, वहीं 2025 में यह बढ़कर 31,870 पहुंच गई। ठगी की रकम भी लगातार बढ़ती गई और वर्ष 2025 में ही 177.81 करोड़ रुपये की ठगी दर्ज की गई।
पांच साल में 468 करोड़ की चपत, हर साल बढ़ता गया ठगी का ग्राफ
उत्तराखंड में साइबर अपराधियों के बढ़ते नेटवर्क का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पांच साल में ठगी की रकम में कई गुना उछाल आया है। वर्ष 2021 में जहां 15 करोड़ रुपये की साइबर ठगी हुई, वहीं 2024 में यह आंकड़ा 167 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। वर्ष 2025 में ठगी की रकम बढ़कर 177.81 करोड़ रुपये दर्ज की गई।
आंकड़े बताते हैं कि साइबर अपराध अब छिटपुट घटनाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि संगठित तरीके से लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। ठग नई तकनीक, फर्जी वेबसाइट, मोबाइल एप और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर लोगों को अपने जाल में फंसा रहे हैं।
शिकायतें बढ़ीं तो पुलिस की चुनौती भी बढ़ी
पांच वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2021 में 4,492 शिकायतें दर्ज हुई थीं। वर्ष 2022 में यह संख्या बढ़कर 11,169, वर्ष 2023 में 18,020, वर्ष 2024 में 23,801 और वर्ष 2025 में 31,870 तक पहुंच गई।
यह बढ़ोतरी बताती है कि साइबर अपराधियों के निशाने पर आने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सबसे बड़ी चुनौती ठगी की रकम को समय रहते फ्रीज कराने और पीड़ितों को उनकी धनराशि वापस दिलाने की है।
70 करोड़ रुपये बचाए, लेकिन पूरी रकम वापस मिलना अलग सवाल
साइबर ठगी के मामलों में पुलिस की कार्रवाई से बचाई गई रकम भी राहत की बात है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 में 1.21 करोड़, 2022 में 2.45 करोड़, 2023 में 7.41 करोड़, 2024 में 30.17 करोड़ और 2025 में 28.59 करोड़ रुपये बचाए गए।
इस तरह पांच वर्षों में करीब 69.83 करोड़ रुपये बचाए जाने का आंकड़ा सामने आया है। हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि बचाई गई रकम और पीड़ितों को वास्तव में वापस मिली रकम एक जैसी नहीं होती। ऐसे में सवाल यह भी है कि ठगी के शिकार लोगों को उनकी पूरी रकम वापस दिलाने के लिए व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
ऑनलाइन ट्रेडिंग का लालच, डिजिटल अरेस्ट का डर
साइबर ठग अब केवल ओटीपी पूछकर बैंक खाते खाली नहीं कर रहे हैं। उनके तरीके लगातार बदल रहे हैं। ऑनलाइन ट्रेडिंग और निवेश के नाम पर लोगों को मोटे मुनाफे का सपना दिखाया जा रहा है। फर्जी ट्रेडिंग एप और व्हाट्सऐप ग्रुप के माध्यम से लोगों का भरोसा जीतकर उनसे लाखों रुपये निवेश कराए जाते हैं। शुरुआत में फर्जी मुनाफा दिखाकर बड़ी रकम जमा कराई जाती है और फिर रकम निकालने के नाम पर टैक्स, फीस और अन्य शुल्क मांगकर पीड़ितों को ठगा जाता है।
वहीं डिजिटल अरेस्ट के मामलों में ठग खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या अन्य जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को फोन करते हैं। फर्जी गिरफ्तारी वारंट और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर उन्हें घंटों वीडियो कॉल पर रखा जाता है। इसके बाद कथित जांच और वेरिफिकेशन के नाम पर बैंक खातों में रकम ट्रांसफर कराई जाती है।
वर्ष 2025 के उपलब्ध विवरण के अनुसार प्रदेश में ऑनलाइन ट्रेडिंग से जुड़े 60 और डिजिटल अरेस्ट के 18 मामले दर्ज किए गए।
रिटायर्ड प्रोफेसर तक नहीं सुरक्षित, पढ़े-लिखे लोग भी गंवा रहे जमा पूंजी
साइबर ठगों का शिकार केवल कम जानकारी रखने वाले लोग नहीं हो रहे हैं। उच्चशिक्षित और अनुभवी लोग भी इनके जाल में फंस रहे हैं। उत्तराखंड में सेवानिवृत्त प्रोफेसर जैसे लोग भी डिजिटल अरेस्ट के नाम पर लाखों और करोड़ों रुपये गंवा चुके हैं।
ठग मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में माहिर हो चुके हैं। वे पीड़ित को इतना डरा देते हैं कि वह परिवार के सदस्यों तक से बात नहीं करता और कथित जांच के नाम पर अपनी जमा पूंजी ठगों के बताए खातों में ट्रांसफर कर देता है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बीच बैंकों की जवाबदेही पर भी सवाल
साइबर ठगी के बढ़ते मामलों के बीच बैंकों की भूमिका और जवाबदेही भी चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट ने साइबर धोखाधड़ी से जुड़े मामलों में वित्तीय संस्थानों की जिम्मेदारी और लापरवाही के पहलुओं पर सख्त रुख अपनाया है।
ऐसे में सवाल उठता है कि संदिग्ध लेनदेन को रोकने के लिए बैंकिंग सिस्टम कितना सतर्क है? ठगी की रकम एक खाते से दूसरे खाते में पहुंचने से पहले उसे रोकने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है? पीड़ितों की शिकायतों पर बैंकों और पुलिस के बीच समन्वय कितना तेज है? इन सवालों के जवाब साइबर अपराध पर लगाम लगाने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं।
ठगी होते ही 1930 पर करें फोन, एक-एक मिनट है कीमती
साइबर ठगी होने पर घबराने के बजाय तुरंत कार्रवाई करना जरूरी है। ठगी की जानकारी मिलते ही राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं। इसके साथ ही आधिकारिक पोर्टल https://cybercrime.gov.in पर भी शिकायत करें।
जितनी जल्दी शिकायत दर्ज होगी, संदिग्ध खातों में पहुंची रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने की संभावना उतनी ही बढ़ सकती है। पीड़ित को बैंक को भी तत्काल सूचना देनी चाहिए और लेनदेन से जुड़े संदेश, स्क्रीनशॉट, कॉल डिटेल तथा अन्य डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने चाहिए।
पांच वर्षों में साइबर ठगी का पूरा आंकड़ा
| वर्ष | शिकायतें | ठगी की रकम |
|---|---|---|
| 2021 | 4,492 | 15 करोड़ रुपये |
| 2022 | 11,169 | 40 करोड़ रुपये |
| 2023 | 18,020 | 69 करोड़ रुपये |
| 2024 | 23,801 | 167 करोड़ रुपये |
| 2025 | 31,870 | 177.81 करोड़ रुपये |
पांच साल का कुल आंकड़ा: करीब 89,352 शिकायतें और 468.81 करोड़ रुपये की ठगी।
आपकी एक छोटी सी गलती बन सकती है लाखों के नुकसान की वजह
साइबर ठगी से बचने के लिए कुछ सावधानियां बेहद जरूरी हैं:
- किसी भी व्यक्ति के साथ ओटीपी, एटीएम पिन और बैंकिंग पासवर्ड साझा न करें।
- अनजान नंबर से आए लिंक पर क्लिक करने से बचें।
- पुलिस, सीबीआई, ईडी या अन्य जांच एजेंसी के नाम पर डिजिटल अरेस्ट की धमकी देने वालों से सावधान रहें।
- किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एक्सेस एप डाउनलोड न करें।
- अनजान क्यूआर कोड स्कैन करने से बचें।
- फर्जी ट्रेडिंग एप और कम समय में पैसा दोगुना करने के दावों से दूर रहें।
- बैंक खाते में एसएमएस और ई-मेल अलर्ट सक्रिय रखें।
- किसी भी संदिग्ध लेनदेन की जानकारी तुरंत बैंक और साइबर हेल्पलाइन को दें।
बड़ा सवाल: उत्तराखंड में पांच वर्षों में 468 करोड़ रुपये से अधिक की साइबर ठगी और करीब 90 हजार शिकायतें इस बात का संकेत हैं कि साइबर अपराध अब गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौती बन चुका है। पुलिस की कार्रवाई और बचाई गई रकम अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन असली सफलता तभी मानी जाएगी जब साइबर ठगों के नेटवर्क पर प्रभावी प्रहार हो, संदिग्ध लेनदेन समय रहते रोके जाएं और ठगी के शिकार लोगों को उनकी मेहनत की कमाई वापस मिल सके।











